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दिल्‍ली: 84 के सिख दंगा मामले में कांग्रेस नेता सज्‍जन कुमार को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई जमानत की अर्जी

वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगा (Anti Sikh Riot) मामले में कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता सज्‍जन कुमार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से तगड़ा झटका लगा है. सज्‍जन कुमार (Sajjan Kumar) ने मेडिकल आधार पर जमानत की अर्जी लगाई थी, जिसे शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया है.

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नई दिल्‍ली. वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता सज्‍जन कुमार को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका लगा है. सज्‍जन कुमार ने मेडिकल आधार पर जमानत की अर्जी लगाई थी, जिसे शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कांग्रेस नेता को अंतरिम राहत देने से इंकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने एम्स (AIIMS) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्‍हें राहत देने से इंकार कर दिया. गौरतलब है कि सिख विरोधी दंगा मामले में सज्जन कुमार को आजीवन कारावास की सजा मिली है. कोर्ट ने कहा कि इस रिपोर्ट में स्‍पष्‍ट कर दिया गया है कि उन्‍हें अस्‍पताल में दाखिल कराने की जरूरत नहीं है. साथ ही कोर्ट ने कहा कि उनकी नियमित जमानत याचिका पर जुलाई में सुनवाई की जाएगी.

दंगों के केसों को दबाने का था पुलिस और प्रशासन का प्रयास
1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलों की जांच करने वाले विशेष जांच दल की रिपोर्ट में चौंकाने वाली बातें सामने आईं थी. इस रिपोर्ट में यह कहते हुए अंगुली उठाई गई थी कि पुलिस, प्रशासन और यहां तक न्यायपालिका की अपराधियों को सजा देने की कोई मंशा नहीं थी और न्यायाधीशों ने ‘सामान्य तरीके से’ आरोपियों को बरी किया था. सुप्रीम कोर्ट ने सिख विरोधी दंगों से संबंधित 186 बंद मामलों की फिर से जांच की निगरानी के लिए विशेष जांच दल का गठन किया है. दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसएन ढींगरा की अध्यक्षता वाले इस जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, पुलिस और प्रशासन का ‘सारा प्रयास’ दंगों से संबंधित आपराधिक मामलों को दबाने का था.

खास लोगों को बचाने के लिए दर्ज किए गए थे मामले

रिपोर्ट के अनुसार, चुनिन्दा व्यक्तियों को बचाने के लिए मामले दर्ज किए गए थे. सुप्रीम कोर्ट ने 11 जनवरी, 2018 को विशेष जांच दल का गठन कर उसे 186 मामलों की जांच की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी थी. पहले दंगों से जुड़े केसों को बंद करने के लिए रिपोर्ट दाखिल कर दी गई थी.

सजा दिलाना नहीं चाहते थे पुलिस और प्रशासन 
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इन अपराधों के लिए अपराधियों को दंडित नहीं करने और उन्हें पाक साफ बताने का मुख्य कारण पुलिस और प्रशासन द्वारा इन मामलों में अधिक दिलचस्पी नहीं लेना और इनमें संलिप्त व्यक्तियों को सजा दिलाने की मंशा से कार्रवाई नहीं करना था.’ रिपोर्ट में इन केसों में निचली अदालतों के रवैये की भी आलोचना की गई है और कहा गया है कि अदालतों द्वारा अलग-अलग तारीखों पर अलग-अलग स्थानों पर किए गए दंगों, हत्याओं, आगजनी और लूटपाट के अनेक मामलों के मुकदमों में की गई कार्रवाई समझ से परे है.

एसआईटी ने की है ये सिफारिश
एसआईटी ने दंगों के कुछ केसों में आरोपियों को बरी करने के निचली अदालतों के आदेशों के खिलाफ विलंब के लिए क्षमा याचना के साथ अपील दायर करने की संभावना तलाशने की सिफारिश की है. रिपोर्ट के अनुसार, ‘1984 के दंगों के आरोपियों को न्यायाधीशों द्वारा सामान्य तरीके से बरी किया गया. रिकॉर्ड के अनुसार किसी भी फैसले से यह पता नहीं चलता कि न्यायाधीश 1984 के दंगों की स्थिति और इन तथ्यों के प्रति सजग थे कि प्राथमिकी दर्ज करने और गवाहों के बयान दर्ज करने में विलंब के लिए पीड़ित जिम्मेदार नहीं थे.’

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